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Thursday, February 2, 2012

सोच-समझकर करें जीवन बीमा के ट्रेडिशनल प्लान में निवेश

(बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण) इरडा ने 1 सितंबर 2010 से (यूनिट लिंक्ड इंश्योरेंस पॉलिसी) यूलिप के नए नियम लागू किए हैं। इन नियमों को लागू करने का उद्देश्य यूलिप प्लान के खर्चों में लगाम लगाना है। इस कदम के बाद इन प्लानों में जीवन बीमा कंपनियों के लाभ एवं एजेंटों के कमीशन में कटौती हो गई है। उल्लेखनीय है कि इरडा ने खर्चों में लगाम सिर्फ यूलिप पॉलिसियों के लिए ही लगाई है एवं ट्रेडिशनल प्लान के खर्चों के संबंध में कोई दिशा-निर्देश जारी नहीं किए हैं, जिससे अब इंश्योरेंस कंपनियां एवं अधिकांश एजेंट ट्रेडिशनल निवेश प्लान की बिक्री पर ही जोर दे रहे हैं। इन प्लान में खर्चों की अधिकता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज भी इन प्लानों में एजेंटों को मिलने वाला प्रथम वर्ष कमीशन 25-30 फीसदी है एवं रिन्यूवल कमीशन न्यूनतम पांच फीसदी है।

इन प्लान में चुकाई गई प्रीमियम का निवेश करके मैच्युरिटी पर एवं मैच्युरिटी पूर्व मृत्यु की स्थिति में सम एश्योर्ड और अर्जित बोनस अदा किया जाता है।

एंडावमेंट प्लान, मनीबेक प्लान, होललाइफ प्लान, पेंशन प्लान एवं चाइल्ड प्लान इस श्रेणी में आते हैं। निश्चित सुरक्षा प्रदान करने की वजह से जीवन बीमा कंपनियों द्वारा इन प्लान का अधिकांश पैसा सरकारी एवं प्राइवेट बॉण्ड में लगाया जाता है। इन प्लान में निवेशकों के पास फंड चुनने का कोई विकल्प नहीं होता है।

क्यों बर्चे ट्रेडिशनल निवेश प्लान से-

कम रिटर्न- सामान्यतः इस प्लान में सालाना रिटर्न 5 से 6 फीसदी ही मिल पाता है। महंगाई के इस दौर में इतने कम रिटर्न से जीवन के लक्ष्यों को प्राप्त करना संभव नहीं है। अतः हमें ऐसे साधनों में निवेश करना होगा, जिससे हम महँगाई दर को मात दे सकें।

कम जीवन बीमा कवर- सामान्यतः इस प्लान में वार्षिक प्रीमियम का 10 से 20 गुना ही कवर मिल पाता है, जिससे हम अधिक बीमा कवर नहीं ले पाते हैं। उदाहरण के लिए यदि किसी व्यक्ति को 25 लाख रुपए का बीमा कवर लेना है तो उसे इस तरह के प्लान के लिए सालाना 1.5 से 2 लाख रुपए का प्रीमियम अदा करना होगी, वहीं इतनी ही अवधि के लिए 30 वर्ष के व्यक्ति का 25 लाख का टर्म प्लान लगभग पांच हजार रुपए वार्षिक की प्रीमियम अदा करके लिया जा सकता है। अतः अधिक बीमा कवर के लिए टर्म प्लान ही उचित है।

लंबी अवधि की बाध्यता- सामान्यतः यह प्लान 10 वर्ष से 25 वर्ष की अवधि के होते हैं। इस प्लान में पूर्ण अवधि तक प्रीमियम चुकाने की बाध्यता होती है अन्यथा यह प्लान लेप्स हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में जीवन बीमा कवर समाप्त हो जाता है एवं अवधि पूर्व सरेंडर करने पर बहुत ही कम राशि वापस मिल पाती है।

तरलता का अभाव-
इस प्लान में मैच्योरिटी के पूर्व पैसों की निकासी नहीं की जा सकती है। बीच में यदि पैसे की जरूरत हो तो मजबूरीवश लोन ही लेना पड़ता है। इस तरह के लोन पर ब्याज दर 9 से 10 प्रतिशत सालाना है। जहाँ एक तरफ हमें इस प्लान में रिटर्न 5 से 6 प्रतिशत सालाना ही मिलता है तो क्या ऐसे में 9 से 10  प्रतिशत ब्याज दर पर लोन लेना समझदारी है?

प्रस्तावित डायरेक्ट टैक्स कोड-
डायरेक्ट टैक्स कोड 1 अप्रैल 2012 से लागू होना प्रस्तावित है। इसके तहत आय से डेढ़ लाख रुपए तक की छूट प्राप्त की जा सकती है। इसकी निम्न 2 सबलीमिट निर्धारित की गई है।

सब लिमिट-1 : एक लाख रुपए तक की छूट, स्वीकृत फंड्स (न्यू पेंशन स्कीम, प्रॉविडेंड फंड, सुपर एन्यूटेशन ग्रेच्युटी आदि) में निवेश पर प्राप्त की जा सकेगी।

सब लिमिट-2 : 50 हजार रुपए तक की छूट, लाइफ इंश्योरेंस (प्रीमियम राशि, बीमा राशि के 5 प्रतिशत से अधिक न होने पर), हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम और बच्चों की ट्यूशन फीस पर प्राप्त की जा सकेगी।

अतः यदि डायरेक्ट टैक्स कोड इसी प्रकार लागू कर दिया जाता है तो इंश्योरेंस प्रीमियम पर छूट सब- लिमिट-2 के आधार पर ही मिल पाएगी।

आपके लिए बेहतर यही होगा कि आप ट्रेडिशनल निवेश प्लान से बर्चे एवं जीवन बीमा के लिए टर्म प्लान लें और निवेश को पृथक रूप से अपनी जोखिम क्षमता अनुसार अलग-अलग निवेश साधनों में करें, जिससे कम खर्च में आप अधिक बीमा कवर प्राप्त कर सकेंगे। साथ ही निवेश को लंबी अवधि तक करने की बाध्यता से छुटकारा, निवेश पर अधिक रिटर्न एवं जरूरत पड़ने पर निवेश को भुना भी सकेंगे।

अतः यदि टैक्स बचत के लिए ट्रेडिशनल निवेश प्लान लेने की योजना बना रहे हैं तो सोच-समझकर ही निर्णय लें। कहीं ऐसा न हो कि बाद में आपको पछताना पड़े?

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